विष्णुधर्मोत्तर पुराण का चित्रसूत्र: भारतीय चित्रकला के महत्वपूर्ण तथ्य

चित्रसूत्र के 9 अध्याय और महत्वपूर्ण तथ्य: TGT, PGT और NET-JRF के लिए विशेष नोट्स।

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प्राचीन मंदिर में भित्ति चित्र (Fresco) बनाते हुए ऋषि नारायण/मार्कण्डेय - चित्रसूत्र के रचयिता।Generated by Gemini AI (Educational Purposes)

विष्णुधर्मोत्तर पुराण का चित्रसूत्र: भारतीय चित्रकला का सबसे प्राचीन ग्रंथ

1. चित्रसूत्र की संरचना

  • मूल स्रोत: चित्रसूत्र, विष्णुधर्मोत्तर पुराण के तीसरे खंड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • अध्याय: चित्रसूत्र, विष्णुधर्मोत्तर पुराण के 35वें से 43वें अध्याय तक कुल 9 अध्यायों में विभाजित है। इन 9 अध्यायों में आयाम मान, प्रमाण, सामान्य मान, प्रतिमा लक्षण, क्षय वृद्धि (Perspective), रंगव्यतिकार और रूप निर्माण जैसे विषयों का वर्णन है।
  • समय: चित्रसूत्र की रचना लगभग 6वीं शताब्दी (गुप्त काल के उत्तरार्ध) में हुई मानी जाती है।
  • विशेषता: यह भारतीय चित्रकला की अत्यंत विकसित और शास्त्रीय परंपरा को दर्शाने वाला सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है।

2. चित्रसूत्र के रचनाकार

  • नारायण मुनि (Narayana Muni): पौराणिक कथाओं के अनुसार, चित्रकला का प्रथम आचार्य भगवान नारायण (नारायण मुनि) को माना जाता है। उन्होंने ही सबसे पहले उर्वशी नामक अप्सरा का चित्र बनाकर चित्रकला को जन्म दिया था।
  • मार्कण्डेय मुनि: विष्णुधर्मोत्तर पुराण के संवादों में मार्कण्डेय मुनि ही राजा वज्र को चित्रकला और अन्य कलाओं का उपदेश देते हैं, इसलिए इन्हें इस ग्रंथ का मुख्य रचयिता या संकलनकर्ता माना जाता है।
  • नग्नजीत (Nagnajit): कुछ विद्वान नग्नजीत को भी चित्रसूत्र (या इससे संबंधित प्राचीन परंपराओं) के प्रणेता के रूप में देखते हैं, विशेषकर ‘चित्रलक्षण‘ के संदर्भ में।

निष्कर्ष: यदि परीक्षा में विकल्प दिए गए हों, तो मार्कण्डेय मुनि या नारायण मुनि में से जो भी विकल्प उपलब्ध हो, उसे सही माना जाएगा।

2. चित्रकला की विशेषता

  • सर्वश्रेष्ठ कला: चित्रसूत्र ग्रंथ के अनुसार चित्रकला को सभी कलाओं में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
  • श्लोक: “कलानां प्रवरं चित्रं धर्मार्थकाममोक्षदं। मांगल्यं प्रथमं चैतद् गृहे यत्र प्रतिष्ठितम्॥” अर्थात कलाओं में चित्रकला श्रेष्ठ है जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाली है। जिस घर में चित्र प्रतिष्ठित होते हैं, वहां मंगल का वास होता है।
  • चित्र की परिभाषा: इसमें कहा गया है कि जिस कृति में आत्मीयता, वेदना (छंद) और अनिर्वचनीय रसमयता हो, वही ‘चित्र’ है।

3. चित्रकला के प्रकार

  • चित्रों के 4 प्रकार: चित्रसूत्र में चित्रों को चार श्रेणियों में बांटा गया है: सत्य, वैणिक, नागर और मिश्र।
  • पुरुषों की 5 श्रेणियां: चित्रसूत्र में पुरुषों की शारीरिक बनावट, ऊँचाई और लक्षणों के आधार पर उन्हें पाँच श्रेणियों में बाँटा गया है। इन सभी की ऊँचाई ‘अंगुल‘ में मापी जाती है: हंस, भद्र, मालव्य, रूचक और शशक।
पुरुष का प्रकार (Type of Man) ऊँचाई (अंगुल में) शारीरिक विशेषता (Key Characteristics)
1. हंस (Hansa) 108 अंगुल सर्वश्रेष्ठ श्रेणी; लंबी भुजाएं, कांतिवान शरीर और हंस जैसी चाल।
2. भद्र (Bhadra) 106 अंगुल सुगठित शरीर, चौड़ी छाती और हाथी जैसी गौरवपूर्ण चाल।
3. मालव्य (Malavya) 104 अंगुल घुटनों तक लंबी भुजाएं (आजानुबाहु) और आकर्षक गठीला शरीर।
4. रूचक (Ruchaka) 100 अंगुल सुंदर मुखाकृति, कलात्मक रुचि और संतुलित कद-काठी।
5. शशक (Shashaka) 92 अंगुल छोटा कद, लेकिन अत्यंत फुर्तीला, चपल और बुद्धिमान स्वभाव।

*नोट: चित्रसूत्र के अनुसार पुरुषों की ऊँचाई का माप ‘अंगुल’ में दिया गया है।

  • आँखों के 5 प्रकार :
  1. चापाकार (योगियों के लिए)
  2. मत्स्योदरा (प्रेमियों के लिए)
  3. उत्पलपत्राभा (शांत व्यक्तियों के लिए)
  4. पद्मपत्रनिभा (देवताओं के लिए)
  5. शशोत्प्लुति (क्रोधित/भयभीत के लिए)।

4. तकनीकी पक्ष : रंग, रेखा और छायांकन

  • मुख्य रंग: चित्रसूत्र में 5 मुख्य रंगों का वर्णन है— श्वेत (सफेद), पीत (पीला), कृष्ण (काला), नील (नीला) और रक्त (लाल)।
  • वर्तना (Shading) के 3 प्रकार: चित्र में गहराई दिखाने के लिए पत्र-वर्तना, रैखिक-वर्तना और बिन्दु-वर्तना का प्रयोग किया जाता है।
  • चित्र के मुख्य अंग: चित्रसूत्र मेंरेखा (Line), वर्तना (Shading/रंग वैविध्य), रूप (Form) और रंग (Color) के प्रयोग पर विस्तृत चर्चा है।
  • विशेष नियम: विद्वान ‘रेखा‘ की, मर्मज्ञ ‘वर्तना‘ की, स्त्रियां ‘अलंकरण‘ की और साधारण लोग ‘रंगों‘ की प्रशंसा करते हैं।

5. मुद्राएं और परिप्रेक्ष्य (Kshaya-Vriddhi)

  • क्षय-वृद्धि: चित्रों में ‘परिप्रेक्ष्य‘ या अंगों के घटने-बढ़ने के नियम को ‘क्षय-वृद्धि’ कहा गया है।
  • 9 स्थान (Postures): इसमें बैठने और खड़े होने की 9 मुख्य मुद्राओं का वर्णन है (जैसे ऋजु, अर्धर्जु आदि)।
  • प्रमाण: चित्र के विभिन्न अंगों के अनुपात (Proportion) को ‘प्रमाण’ कहा गया है। इसमें माप की इकाई ‘ताल‘ मानी गई है।

6. रस और भाव

  • चित्रसूत्र में भावों की सशक्त अभिव्यक्ति के लिए 9 रसों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
  • चित्रकला में इन रसों का प्रयोग पात्रों के मानसिक और शारीरिक अवस्था को दर्शाने के लिए किया जाता है।
  • यहाँ उन 9 रसों और उनके द्वारा प्रकट होने वाले भावों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:
रस (Rasa) प्रकट होने वाला भाव (Emotion) चित्रण की विशेषता (Visual Feature)
1. शृंगार (Shringara) प्रेम और सौंदर्य सुसज्जित पात्र और प्रसन्न मुख
2. हास्य (Hasya) आनंद और हँसी चेहरे पर मुस्कान और उल्लास
3. करुण (Karuna) दुख और दया आँखों में आँसू और उदासी
4. वीर (Veera) उत्साह और साहस गर्व से तनी छाती और दृढ़ मुख
5. रौद्र (Raudra) क्रोध और प्रतिशोध लाल आँखें और तनी हुई भौहें
6. भयानक (Bhayanaka) भय और डर डरी हुई आँखें और कांपती मुद्रा
7. बीभत्स (Bibhatsa) घृणा और ग्लानि अरुचिकर और वीभत्स दृश्य
8. अद्भुत (Adbhuta) विस्मय और आश्चर्य फटी आँखें और चकित भाव
9. शांत (Shanta) शांति और वैराग्य सौम्य चेहरा और ध्यान मुद्रा
  • सर्वोत्तम रस: चित्रसूत्र में शृंगार रस को चित्रों के लिए सबसे उपयुक्त और उत्तम माना गया है।

  • रसों का स्थान: चित्रसूत्र. के अनुसार, जिस चित्र में रसों का सही समावेश होता है, वही दर्शक के मन को आनंदित कर पाता है।

7. अनुवाद

  • अंग्रेजी अनुवाद: चित्रसूत्र का सर्वप्रथम अंग्रेजी भाषा में अनुवादडॉ. स्टेला क्रैमरिश के द्वारा किया गया, बाद में डॉ. आनन्द कुमार स्वामी ने भी किया।

 

चित्रसूत्र: महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (FAQs)

Q1. चित्रसूत्र किस पुराण का हिस्सा है और इसमें कितने अध्याय हैं?
उत्तर: चित्रसूत्र “विष्णुधर्मोत्तर पुराण” के तीसरे खंड के “अध्याय 35 से 43” तक विस्तृत है। इसमें कुल “9 अध्याय” हैं।
Q2. चित्रसूत्र के अनुसार चित्रकला के 4 प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर: चित्रसूत्र में चित्रों को चार श्रेणियों में बाँटा गया है: 1. “सत्य”, 2. “वैणिक”, 3. “नागर” और 4. “मिश्र”।
Q3. चित्रसूत्र में रसों की संख्या कितनी बताई गई है?
उत्तर: चित्रसूत्र में कुल “9 रसों” का वर्णन है, जिसमें “श्रृंगार रस” को चित्रकला के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
Q4. चित्रसूत्र में किन 5 मुख्य रंगों का उल्लेख मिलता है?
उत्तर: चित्रसूत्र के अनुसार 5 प्राथमिक रंग हैं: “श्वेत (सफेद), पीत (पीला), कृष्ण (काला), नील (नीला) और रक्त (लाल)”।
Q5. चित्रसूत्र में ‘क्षय-वृद्धि’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: “‘क्षय-वृद्धि'” का अर्थ चित्रकला में “परिप्रेक्ष्य (Perspective)” से है, जो अंगों के घटने-बढ़ने के नियम को स्पष्ट करता है।
Q6. चित्रसूत्र के रचयिता कौन माने जाते हैं?
उत्तर: इस ग्रंथ की रचना का श्रेय “मार्कण्डेय मुनि” या “नारायण मुनि” को दिया जाता है।
Q7. चित्रसूत्र में पुरुषों के कितने प्रकार बताए गए हैं?
उत्तर: शारीरिक बनावट के आधार पर पुरुषों के “5 प्रकार” बताए गए हैं: हंस, भद्र, मालव्य, रूचक और शशक।
Q8. चित्रसूत्र का सर्वप्रथम अंग्रेजी अनुवाद किसने किया?
उत्तर: इसका सर्वप्रथम अंग्रेजी अनुवाद “डॉ. स्टेला क्रैमरिश” ने किया था।
Q9. चित्रसूत्र में ‘वर्तना’ के कितने प्रकार बताए गए हैं?
उत्तर: वर्तना (छायांकन) के “3 प्रकार” बताए गए हैं: 1. पत्र-वर्तना, 2. रैखिक-वर्तना और 3. बिन्दु-वर्तना।
Q10. चित्रसूत्र में आँखों के कितने प्रकारों का वर्णन है?
उत्तर: चित्रसूत्र में पात्रों के अनुसार “5 प्रकार की आँखों” (चापाकार, मत्स्योदरा, उत्पलपत्राभा, पद्मपत्रनिभा, शशोत्प्लुति) का वर्णन है।
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