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भारतीय प्रागैतिहासिक चित्रकला का उद्भव और इतिहास | Origin of Prehistoric Art

जानिए भारतीय चित्रकला का उद्भव चट्टान चित्रकारी (Rock Art) से कैसे हुआ और पाषाण काल में कन्दराओं और गुफाओं में मानव चित्रण के प्रमाण कहाँ से मिले।

Admin
Last updated: March 10, 2026 4:24 pm
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7 Min Read
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भारतीय प्रागैतिहासिक चित्रकला का उद्भव और विकास

भारतीय चित्रकला का इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना है, जिसकी जड़ें प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period) की चट्टान चित्रकारी (Rock Art) में गहराई से जुड़ी हुई हैं। इतिहास का वह काल जिसका कोई लिखित विवरण नहीं मिलता, उसे प्रागैतिहासिक काल कहा जाता है। आदिमानवों द्वारा कन्दराओं और गुफाओं में उकेरी गई मूक भावनाएं ही आज हमारे लिए उस युग की सभ्यता और संस्कृति को समझने का एकमात्र साधन हैं।

Ancient Indian prehistoric rock paintings on a cave wall depicting animals and hunters, representing the origin and development of Indian cave art
यहाँ प्रागैतिहासिक चित्रकला के उद्भव, विकास और इसकी प्रमुख विशेषताओं को विस्तार से समझाया गया है:

1. प्रागैतिहासिक कला: अर्थ और प्रथम खोज

  • शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग: ‘प्रागैतिहासिक’ (Prehistoric) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1851 ई. में स्कॉटलैण्ड के वैज्ञानिक ‘डेनियल विल्सन’ ने अपनी पुस्तक “द अर्कियोलाजी एण्ड प्री हिस्टोरिक एनालसस ऑफ स्कॉटलैण्ड” में किया था।
  • विश्व में प्रथम प्रमाण: प्रागैतिहासिक कला का विश्व में सबसे पहला प्रमाण 1879 ई. में स्पेन की ‘अल्तामीरा गुफा’ (Altamira Cave) से प्राप्त हुआ था।
  • भारत में प्रथम खोज: भारत में प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की खोज सर्वप्रथम अंग्रेजों ने की थी। 1880 ई. में आर्चीवाल्ड कार्लाइल (Archibald Carlleyle) और जॉन काकबर्न (John Cockburn) ने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर (कैमूर की पहाड़ियों/घोड़मंगर) में सबसे पहले गुफा चित्रों की खोज की।
  • औजारों की खोज: इससे पूर्व 1863 ई. में ‘ब्रुसफुट’ नामक विद्वान ने मद्रास के समीप ‘पल्लावरम्’ में प्रस्तर (पत्थर) युग के औजार खोजे थे।

2. पाषाण काल के तीन चरण और कला का विकास

पुरातत्ववेत्ता सी.जे. थामसन ने प्रागैतिहासिक काल को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया है:

  • पुरापाषाण काल (30,000 ई.पू. – 25,000 ई.पू.): इस युग का मानव शिकारी था। वह प्रकृति निर्मित गुफाओं में रहता था और पत्थर, हड्डी व लकड़ी के मोटे और भद्दे औजार बनाता था।
  • मध्यपाषाण काल (25,000 ई.पू. – 10,000 ई.पू.): इस काल में पशुपालन का प्रारम्भ हुआ।
  • नवपाषाण या उत्तर पाषाण काल (10,000 ई.पू. – 3000 ई.पू.): चित्रकला की दृष्टि से यह सबसे महत्वपूर्ण काल है। भारत में सबसे अधिक प्रागैतिहासिक चित्र इसी काल के पाए गए हैं। इस युग में मानव ने कृषि और चाक (पहिये) का आविष्कार कर लिया था। मानव स्थायी घर बनाकर रहने लगा, मिट्टी के बर्तनों (Pottery) का निर्माण शुरू हुआ और औजारों पर पॉलिश की जाने लगी।

3. चित्रकला का धरातल और तकनीक

  • धरातल (Canvas): प्रागैतिहासिक चित्र प्रायः खुरदरी चट्टानों की दीवारों, गुफाओं के फर्शों, छतों या भित्तियों (Rock Shelters) पर बनाए गए हैं। आकृतियों को बनाने से पहले गुफा की पृष्ठभूमि पर किसी भी प्रकार के रंग की कोई परत (Primer/Base) नहीं लगाई जाती थी।
  • तूलिका (Brush): चित्र बनाने के लिए किसी रेशेदार लकड़ी, बाँस या नरकुल आदि को कूटकर तूलिका (ब्रश) बनाई जाती थी। पशुओं के पुट्ठे की हड्डी की प्याली को रंग घोलने के काम में लिया जाता था।
  • पद्धति: इन चित्रों में क्षेपांकन (Stencil) पद्धति का भी प्रयोग देखने को मिलता है। बहुत कम और टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से गति और शक्ति का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

4. प्रागैतिहासिक चित्रों के प्रमुख रंग (भूमिज रंग)

आदिमानव ने प्रकृति में उपलब्ध मिट्टी के रंगों (भूमिज रंगों) का ही इस्तेमाल किया:

  • चित्रों में मुख्य रूप से लाल (गेरू एवं हिरौंजी), काले (कोयला या काजल) और सफेद (खड़िया) रंगों का प्रयोग किया गया है।
  • रंगों को चट्टानों पर स्थायी बनाने के लिए, इस्तेमाल करने से पूर्व उनमें जानवरों की चर्बी (Animal fat) मिलाई जाती थी।
  • उत्तरकाशी की ‘हुडली गुफा’ जैसे कुछ दुर्लभ स्थानों पर नीले रंग के प्रयोग के भी साक्ष्य मिले हैं।

5. चित्रों का मुख्य विषय: शिकार (आखेट)

आदिमानव का पूरा जीवन जंगल और शिकार पर आश्रित था, इसलिए प्रागैतिहासिक चित्रों का मुख्य विषय ‘पशु और उनका आखेट (शिकार)’ ही रहा है:

  • चित्रों में बारहसिंगा, महिष, हाथी, घोड़ा, सुअर, गैंडा, भालू, बैल, चीता आदि जानवरों का शिकार करते हुए मानव समूहों को दर्शाया गया है।
  • प्रागैतिहासिक काल के चित्रकारों को ‘ओझा’ (Shaman) कहा जाता था। चित्र बनाने के पीछे उनका उद्देश्य केवल आत्मसंतुष्टि ही नहीं, बल्कि जादुई शक्तियों पर विश्वास और शिकार में सफलता प्राप्त करने का टोटका भी था।
  • पशुओं के अलावा चित्रों में स्वास्तिक, त्रिभुज, वृत्त, षटकोण और आयताकार जैसे ज्यामितीय आकारों का भी प्रयोग प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को दर्शाने के लिए किया गया।

6. भारत में प्रागैतिहासिक कला के प्रमुख केंद्र

  • भीमबेटका (मध्य प्रदेश): इसकी खोज 1957-58 ई. में प्रो. वी.एस. वाकणकर ने की थी। यहाँ लगभग 600 गुफाएं हैं, जिनमें से 275 में चित्र मिले हैं। यहाँ ‘शिकार नृत्य’ के भी चित्र प्राप्त हुए हैं।
  • पंचमढ़ी (मध्य प्रदेश): 1936 ई. में डी.एच. गार्डेन ने यहाँ के चित्रों की खोज की। यहाँ सांभर और शेर के आखेट के दृश्य प्रसिद्ध हैं।
  • सिंघनपुर (छत्तीसगढ़): 1910 ई. में डब्ल्यू. एण्डर्सन द्वारा खोजे गए इस केंद्र में ‘घायल भैंसा’ (मरता हुआ भैंसा) और ‘असंयत कंगारू’ के अत्यंत प्रसिद्ध चित्र हैं।
  • दक्षिण भारत: बेल्लारी (कर्नाटक) के नवपाषाण कालीन चित्रों की खोज 1892 में एफ. फासेट ने की थी।

7. इस विषय के प्रमुख विद्वान और पुस्तकें

प्रागैतिहासिक चित्रों का अनुशीलन करने वाले प्रमुख विद्वानों ने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें रची हैं:

  • ‘प्रि-हिस्टोरिक पेन्टिंग’ (1958): एलन हाटन बाड्रिक
  • ‘प्रि-हिस्टोरिक इण्डिया’ (1950): स्टुअर्ट पिगट
  • ‘भारतीय प्रागैतिहासिक चित्रकला’: डॉ. जगदीश गुप्त

निष्कर्ष: भारतीय प्रागैतिहासिक चित्रकला ‘रेखा-प्रधान’ कला है। आदिमानवों ने अनगढ़ पत्थरों के बीच रहकर भी अपनी कला के माध्यम से अपनी अनुभूतियों और उल्लास को अमर कर दिया, जो आज हमारे लिए कला और मानव विकास के इतिहास का सबसे बड़ा स्रोत है।

छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक चित्र: सिंघनपुर की गुफाओं का रहस्य और इतिहास
TAGGED:Bhimbetka CavesHistory of Indian ArtIndian Rock PaintingsOrigin of Prehistoric ArtPaleolithic ArtPragaitihasik ChitrakalaStone Age India

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